कुछ दिन पहले मैं जबलपुर गया था एक परीक्षा देने, कुछ और भी बन्दे जा
रहे था क्योंकि वहां पर आर्मी की भर्ती भी थी । सौभाग्य से उस डिब्बे
में एक दो आर्मी के जवान भी थे । बातों बातों में पता चला कि कौन कहां जा
रहा है। कुछ ग्रामीण आदमी भी थे, और कुछ शहरी । लोगों ने कहा - बस, यह दौड़
निकाल लो, फिर तो जिन्दगी भर ऐश ही ऐश है, खाने को काजू, बादाम हर प्रकार
की मेवा मिलेगी, जब तक नौकरी है तब तक सुविधा और नौकरी के बाद पेंशन तो
मिलेगी ही । बहुत ही अच्छी नौकरी है आर्मी की ।
उन की बात सुनकर आर्मी वाले जवानों ने कहा- सर आप लोग किसी गलतफहमी में हैं क्योंकि आर्मी में ऐसा कोई नियम नहीं है कि आपको मेवा, और सभी सुविधाएं दी ही जाएंगीं । तब उन लोगों का कहना था कि आपको पता नहीं मेरी जानकारी में तो सब सुविधाएं हैं, बस एक बार कैसे भी काम बन जाए उसके बाद आराम ही आराम है ।
तब उन जवानों ने बताया कि वह खुद आर्मी जवान हैं, और रही बात सुविधा की तो वह तो सरकार केवल उन्हें देती है जो लद्दाख या अन्य ठण्डे इलाकों में तैनात होते हैं, और वह भी इसलिए ताकि वे देश की सेवा के लायक रह सकें । आप लोग सर्दी आते ही रजाई में घुस जाते हैं रात को बाहर निलकने की उम्मीद नहीं करते पर हम लोग बर्फ पर खडे रहते हैं चाहे रात हो या दिन । अब अगर खाने को कुछ ऐसा नहीं मिलेगा कि हम ठण्ड झेल सकें तो क्या हम बर्फ खाएंगे, तब तो हो गई देश की रक्षा ।
आज ऐसी ही मानसिकता वाले लोग छाए हैं देश में । कुछ लोग केवल यह चाहते हैं कि उनका भण्डार कुबेर की भांति भरा रहे । बस में जाएंगे तो किराया नहीं देंगे, उनका किराया किसी और को चुकाना पड़ता है क्योंकि बस मालिक को तो लाभ चाहिए, किराया किसी से भी वसूल हो । जब ऐसे लोग ट्रेन में जाते हैं तो टिकट नहीं लेते, और जब रेल मंत्रालय का नुकसान होता है तो कहते हैं कि किराया बढ़ा दिया । जब अस्पताल में जाते हैं तो एक रूपये की पर्ची कटाने में संकोच करते हैं पर मुफ्त की दवा ऐसे भर लाते हैं जैसे वह उनके घर की चीज हो ।
आज हर आदमी एक की बात सोचता है कि सरकार के पास पैसा तो इतना है पर वह देश का विकास नहीं करती । इन लोगों को इतना भी नहीं पता कि देश की आय से ही देश के सभी काम होते हैं यह लोग जिस अस्पताल में एक रूपये का पर्चा भी नहीं बनवाते वहां पर कई कर्मचारी और अधिकारी कहां से वेतन पाते हैं ? हम एक रूपये देना नहीं चाहते पर सरकार से एक करोड़ रूपये की सहायता की उम्मीद करते हैं जबकि हम अच्छी तरह से जानते हैं कि सरकार के पास जो पैसा है वह हमारा ही दिया हुआ होता है ।
सरकार गरीब किसान का अनाज 10 रूपये में लेकर उसे राशन की दुकान पर 2 रूपये में देती है, कई योजनाएं चलाती है, स्कूल में पढ़ाई करवाती है शिक्षकों को पगार देती है, हर योजना आम नागरिक के लिए एकदम फ्री है, इसके बावजूद भी आदमी हर दम केवल सरकार को कोसता रहता है । जबकि देखा जाए तो उसने अपने पूरे जीवनकाल में एक दायित्व तक नहीं निभाया होता ।
कहते हैं जो चीज हमें सहज मिलती है उसकी हम कीमत नहीं जानते हैं । सरकार की योजनाएं, सहायता हमें मिलने के बाद भी हम अपना कर्तव्य निभाते नहीं उल्टे सरकार के काम में रूकावट पैदा करते रहते हैं । कोई काम होना है तो उसके विरोध में आन्दोलन करेंगे, हड़ताल करेंगे, अगर कहीं रोड बन रहा तो उस पर से वाहन गुजार देंगे, कहीं कोई चीज लगी है तो उसे तोड़ देंगे, सरकारी स्थल में साफ-सफाई दिखी तो गंदगी तो फैला ही देंगे । यानि विकास सरकार करती है पर उसमें सहयोग करने के बजाय उसकी जड़ उखाड़ने पर तुल जाते हैं ।
ऐसे लोगों की आज देश में भरमार है पर समस्या यह है कि ऐसे लोग अंग्रेज नहीं हैं जिन्हें पीटकर भगाया जा सके यह हमारे अपने ही लोग हैं बस समाज की गलत प्रथा और सोच ने उन्हें एक हैवान का रूप दे दिया होता है, और उनकी हैवानियत का उनकी आगामी पीढ़ी और वर्तमान समाज पर बुरा असर पड़ता है । इसलिए आज जरूरत है कि LIC की पॉलिसी को प्रधानता नहीं देनी चाहिए बल्कि अपने बच्चों को एक सभ्य नागरिक बनाना चाहिए क्योंकि LIC की पॉलिसी तो केवल पैसे बढ़ा सकती हैं, संस्कार और देश की संस्कृति नहीं ।
उन की बात सुनकर आर्मी वाले जवानों ने कहा- सर आप लोग किसी गलतफहमी में हैं क्योंकि आर्मी में ऐसा कोई नियम नहीं है कि आपको मेवा, और सभी सुविधाएं दी ही जाएंगीं । तब उन लोगों का कहना था कि आपको पता नहीं मेरी जानकारी में तो सब सुविधाएं हैं, बस एक बार कैसे भी काम बन जाए उसके बाद आराम ही आराम है ।
तब उन जवानों ने बताया कि वह खुद आर्मी जवान हैं, और रही बात सुविधा की तो वह तो सरकार केवल उन्हें देती है जो लद्दाख या अन्य ठण्डे इलाकों में तैनात होते हैं, और वह भी इसलिए ताकि वे देश की सेवा के लायक रह सकें । आप लोग सर्दी आते ही रजाई में घुस जाते हैं रात को बाहर निलकने की उम्मीद नहीं करते पर हम लोग बर्फ पर खडे रहते हैं चाहे रात हो या दिन । अब अगर खाने को कुछ ऐसा नहीं मिलेगा कि हम ठण्ड झेल सकें तो क्या हम बर्फ खाएंगे, तब तो हो गई देश की रक्षा ।
आज ऐसी ही मानसिकता वाले लोग छाए हैं देश में । कुछ लोग केवल यह चाहते हैं कि उनका भण्डार कुबेर की भांति भरा रहे । बस में जाएंगे तो किराया नहीं देंगे, उनका किराया किसी और को चुकाना पड़ता है क्योंकि बस मालिक को तो लाभ चाहिए, किराया किसी से भी वसूल हो । जब ऐसे लोग ट्रेन में जाते हैं तो टिकट नहीं लेते, और जब रेल मंत्रालय का नुकसान होता है तो कहते हैं कि किराया बढ़ा दिया । जब अस्पताल में जाते हैं तो एक रूपये की पर्ची कटाने में संकोच करते हैं पर मुफ्त की दवा ऐसे भर लाते हैं जैसे वह उनके घर की चीज हो ।
आज हर आदमी एक की बात सोचता है कि सरकार के पास पैसा तो इतना है पर वह देश का विकास नहीं करती । इन लोगों को इतना भी नहीं पता कि देश की आय से ही देश के सभी काम होते हैं यह लोग जिस अस्पताल में एक रूपये का पर्चा भी नहीं बनवाते वहां पर कई कर्मचारी और अधिकारी कहां से वेतन पाते हैं ? हम एक रूपये देना नहीं चाहते पर सरकार से एक करोड़ रूपये की सहायता की उम्मीद करते हैं जबकि हम अच्छी तरह से जानते हैं कि सरकार के पास जो पैसा है वह हमारा ही दिया हुआ होता है ।
सरकार गरीब किसान का अनाज 10 रूपये में लेकर उसे राशन की दुकान पर 2 रूपये में देती है, कई योजनाएं चलाती है, स्कूल में पढ़ाई करवाती है शिक्षकों को पगार देती है, हर योजना आम नागरिक के लिए एकदम फ्री है, इसके बावजूद भी आदमी हर दम केवल सरकार को कोसता रहता है । जबकि देखा जाए तो उसने अपने पूरे जीवनकाल में एक दायित्व तक नहीं निभाया होता ।
कहते हैं जो चीज हमें सहज मिलती है उसकी हम कीमत नहीं जानते हैं । सरकार की योजनाएं, सहायता हमें मिलने के बाद भी हम अपना कर्तव्य निभाते नहीं उल्टे सरकार के काम में रूकावट पैदा करते रहते हैं । कोई काम होना है तो उसके विरोध में आन्दोलन करेंगे, हड़ताल करेंगे, अगर कहीं रोड बन रहा तो उस पर से वाहन गुजार देंगे, कहीं कोई चीज लगी है तो उसे तोड़ देंगे, सरकारी स्थल में साफ-सफाई दिखी तो गंदगी तो फैला ही देंगे । यानि विकास सरकार करती है पर उसमें सहयोग करने के बजाय उसकी जड़ उखाड़ने पर तुल जाते हैं ।
ऐसे लोगों की आज देश में भरमार है पर समस्या यह है कि ऐसे लोग अंग्रेज नहीं हैं जिन्हें पीटकर भगाया जा सके यह हमारे अपने ही लोग हैं बस समाज की गलत प्रथा और सोच ने उन्हें एक हैवान का रूप दे दिया होता है, और उनकी हैवानियत का उनकी आगामी पीढ़ी और वर्तमान समाज पर बुरा असर पड़ता है । इसलिए आज जरूरत है कि LIC की पॉलिसी को प्रधानता नहीं देनी चाहिए बल्कि अपने बच्चों को एक सभ्य नागरिक बनाना चाहिए क्योंकि LIC की पॉलिसी तो केवल पैसे बढ़ा सकती हैं, संस्कार और देश की संस्कृति नहीं ।
bahut behatar likhate hain aise hi likhate rahiye aur ho sake to koi book bhi likhana suru kar den
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